आजादी के बाद यूपी की सियासत में 1989 तक ब्राह्मण का वर्चस्व कायम रहा और 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने. गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने. ये सभी कांग्रेस से थे. इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे.
अगर इन मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को देखें तो करीब 23 साल तक प्रदेश की सत्ता की कमान ब्राह्मण समुदाय के हाथ में रही है. बीजेपी में अटल विहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी से लेकर कलराज मिश्रा जैसे ब्राह्मण नेता चेहरा हुआ करते थे, फिर भी सत्ता में कांग्रेस की तरह उनकी हनक नहीं रही.
1989 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई है जबकि पिछले दिनों से सपा से लेकर बसपा और बीजेपी की कई बार सरकारें बनी लेकिन सूबे को ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं मिला. उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सत्ता की कमान ब्राह्मण समुदाय के हाथों में रही है.
नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं बन सका. सूबे में पिछले 3 दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समुदाय महज एक वोट बैंक बनकर रह गया है. बसपा ने यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन का आगाज कर सभी दलों को बेचैन कर दिया है. यही वजह है कि 2022 के चुनाव में बसपा के बाद सपा से लेकर बीजेपी और कांग्रेस तक ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुट गई हैं.
कांग्रेस के राज में ज्यादातर मुख्यमंत्री ब्राह्मण समुदाय के बने, लेकिन बीजेपी के उदय के साथ ही ब्राह्मण समुदाय का कांग्रेस से मोहभंग हुआ. यूपी में जिस भी पार्टी ने पिछले तीन दशक में ब्राह्मण कार्ड खेला, उसे सियासी तौर पर बड़ा फायदा हुआ है.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को 72 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट दिया जबकि सपा-बसपा को 5-5 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले. कांग्रेस को लगभग 11 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट दिया. 2019 लोकसभा में बीजेपी को 82 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया लेकिन लेकिन सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस को 6-6 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले.
2017 यूपी विधानसभा में बीजेपी को 80 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया. यूपी में कुल 58 ब्राह्मण विधायक जीते, जिनमें 46 विधायक बीजेपी से बने थे. वहीं, 2012 विधानसभा में जब सपा ने सरकार बनायी थी तब बीजेपी को 38 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे.
सपा के टिकट पर 21 ब्राह्मण समाज के विधायक जीतकर आए थे. 2007 विधानसभा में बीजेपी को 40 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे. 2007 में BSP ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का सफल प्रयोग किया था, जिसे बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया था.
यूपी की सियासत में मायावती ने 2007 में ब्राह्मण महत्व दिया था, जिसके चलते प्रदेश में ब्राह्मण वोटों का महत्व बढ़ा दिया. तब से जो भी दल सत्ता में आए उसमें ब्राह्मण वोटों की अहम भूमिका रही, 2007 में जब मायावती सत्ता में आईं तो उस समय बीएसपी से 41 ब्राह्मण विधायक चुने गए.
1993 में बसपा से महज एक ब्राह्मण विधायक था, लेकिन चुनाव दर चुनाव यह आंकड़ा बढ़ता गया. 2007 के यूपी चुनाव में सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 17 फीसदी ब्राह्मणों ने ही मायावती को वोट दिया था और इसमें से भी अधिकतर वोट बसपा को वहां मिले थे जहां उसने ब्राह्मण उम्मीदवार खड़े किए थे.
बीजेपी से 2017 के चुनाव में सबसे ज्यादा 58 ब्राह्मण विधायक बने, लेकिन इससे पहले बीजेपी से जीते ब्राह्मणों की संख्या 20 से ज्यादा नहीं बढ़ी थी. 2002 से लेकर 2012 तक तो बीजेपी से जीतने वाले ब्राह्मणों की संख्या दहाई का अंक भी नहीं छू पाई थी.
सपा से सबसे ज्यादा 21 ब्राह्मण 2012 के चुनाव में जीतकर आए थे जबकि इससे पहले यह आंकड़ा 11 तक ही सिमटा रहा है. वहीं, कांग्रेस 90 के बाद से दहाई का अंक कभी क्रॉस नहीं कर सकी. ऐसे में यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर ब्राह्मण वोटों पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं. मायावती और अखिलेश के बाद भाजपा भी चौकन्नी नजर आ रही है डर है कहीं ब्राह्मण वोट बैंक ना कट जाए. लेकिन अगर आंकड़ों पर ध्यान दें तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जिसने सत्ता में रहते हुए उत्तर प्रदेश को 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री दिए हैं, बांकि पार्टियां तो सिर्फ वोट बैंक की तरह उपयोग करती रही हैं.

